फिल्ममेकिंग के 3 स्तंभ: बिजनेस, क्राफ्ट और आर्ट :
(The Hierarchy of Cinematic Success)
फिल्म इंडस्ट्री में सफलता के तीन रास्ते हैं, लेकिन मंजिल तक सिर्फ एक ही रास्ता सबसे ऊपर जाता है। एक फिल्ममेकर के तौर पर आपको यह तय करना होगा कि आप किस नींव पर अपनी इमारत खड़ी कर रहे हैं।
1. बिजनेस (Business) –
सबसे कमजोर नींव जब फिल्म ‘कैलकुलेटर’ रखकर बनाई जाती है। यहाँ फिल्ममेकर यह सोचता है—”अभी क्या ट्रेंड में है? एक्शन चल रहा है तो एक्शन बना दो।” यह फिल्ममेकिंग का सबसे निचला स्तर है। जब आप सिर्फ पैसा कमाने के लिए फिल्म बनाते हैं, तो वह फिल्म एक ‘प्रोडक्ट’ बनकर रह जाती है। इसमें न रूह होती है, न इमोशन। ऐसी फिल्में रिलीज के पहले हफ्ते में दम तोड़ देती हैं और ऑडियंस उन्हें ‘कचरा’ मानकर नकार देती है। बिजनेस को ध्यान में रखकर बनाई गई फिल्म, बिजनेस में ही सबसे ज्यादा पिटती है।
2. क्राफ्ट (Craft) –
सजावट और तकनीक यह क्रिएटिविटी का स्तर है। यहाँ फोकस तकनीक पर होता है—बेहतरीन कैमरा वर्क, शानदार एडिटिंग, वीएफएक्स और विजुअल्स। क्राफ्ट वाली फिल्में आँखों को बहुत सुंदर लगती हैं। ये फिल्में सफल भी होती हैं क्योंकि इनमें मेहनत दिखती है। लेकिन, अगर सिर्फ क्राफ्ट है और आत्मा नहीं, तो यह एक ‘खूबसूरत पुतले’ की तरह है—दिखने में अच्छा, पर अंदर से खाली।
3. आर्ट (Art) –
सर्वोच्च शिखर (The Soul) यह फिल्ममेकिंग का सबसे ऊंचा और सफल स्तर है। आर्ट का मतलब है—सच्चाई और जज्बात। जब एक फिल्ममेकर आर्ट के साथ फिल्म बनाता है, तो वह ट्रेंड या तकनीक की चिंता नहीं करता, वह ‘इंसानी अहसास’ (Human Emotion) को स्क्रीन पर उतारता है। इतिहास गवाह है, दुनिया की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली और ब्लॉकबस्टर फिल्में वही हैं जो ‘आर्ट’ को केंद्र में रखकर बनाई गईं।
निष्कर्ष (The Golden Rule) बिजनेस वाली फिल्म दिमाग से बनती है, लेकिन आर्ट वाली फिल्म ‘दिल’ से बनती है। ऑडियंस दिमाग को भूल सकती है, पर दिल को नहीं। इसलिए, जो आर्ट (कला) को साधेगा, वही अंत में सबसे बड़ा बिजनेस भी करेगा और सिनेमा के इतिहास में अमर भी होगा।