धुरंधर जैसी फिल्में क्यों अधूरी महसूस होती हैं?
(The Mistake of Big Budget Movies)
सबसे बड़ी गलती: हमने अक्सर देखा है कि बड़े बजट और बड़े स्टार्स वाली “धुरंधर” फिल्में भी बॉक्स ऑफिस पर तो बहुत अच्छा काम करती है लेकिनफिल्म खत्म होने के बाद एपिक फिल्म की तरह वह फिल्म हमारे दिल में बस कर हमारे साथ घर नहीं जाती है।
इसका सबसे बड़ा कारण है—फिल्म का ‘स्टोरी-ड्रिवन’ (Story-Driven) होना।
जब राइटर पहले ‘कहानी’ सोचता है और फिर उस कहानी में कैरेक्टर को जबरदस्ती फिट करता है, तो फिल्म बनावटी लगती है। इसमें घटनाएं (Events) तो होती हैं, लेकिन इमोशन नहीं होता।
सच्चाई यह है कि दुनिया की बेहतरीन फिल्में ‘कैरेक्टर-ड्रिवन’ (Character-Driven) होती हैं। यानी कहानी कैरेक्टर को नहीं चलाती, बल्कि कैरेक्टर कहानी को चलाता है।
इसे ठीक करने के लिए मैंने एक शॉर्टकट बनाया है—STP टेक्निक।
STP क्या है? (S = Story, T = Through, P = Protagonist/Person) यानी: “कहानी, व्यक्ति के माध्यम से।”
अगर आप चाहते हैं कि आपकी फिल्म सुपर-हिट हो, तो आपको STP रूल फॉलो करना होगा:
- S (Story): कहानी महत्वपूर्ण है, लेकिन यह बॉस नहीं है।
- T (Through): कहानी को सीधा ऑडियंस को मत सुनाओ, उसे ‘गुज़ारो’।
- P (Protagonist): अपने मुख्य किरदार (Protagonist) के अंदर से।
इसका मतलब (Why it works): जब फिल्म STP टेक्निक पर बनती है, तो ऑडियंस यह नहीं देखती कि “फिल्म में क्या हो रहा है?” बल्कि वे यह महसूस करते हैं कि “हीरो पर क्या बीत रही है?”
- गलत तरीका: बम फटा और हीरो भाग गया। (यह सिर्फ प्लॉट है)।
- STP तरीका: बम फटने से पहले हीरो के हाथ कांप रहे थे, उसे अपने बच्चे की याद आई, फिर उसने वायर काटा। (यह कैरेक्टर है)।
निष्कर्ष: बड़ी फिल्में इसलिए पिटती हैं क्योंकि वे ‘घटनाएं’ दिखाती हैं। हिट फिल्में इसलिए चलती हैं क्योंकि वे STP के जरिए ‘इंसान’ को दिखाती हैं। याद रखिये—ऑडियंस प्लॉट देखने नहीं, इंसान को जीने आती है।